मधेशमे रहे मधेशीयोका एहि है कहानी : एम के मोरबैता

हम इन्सान है परंतु हमारी राष्ट्रिय पहचान कहीं नहीं | हम जहाँ रहते हैं, वह राज्य नहीं हिरासत है | हम सम्मान ढुँढते हैं परंतु मिलता अपमान के सिवाय कुछ भी नहीं |

हँसी आती है पर हँसना मना है | रोना आता है परंतु यह भी बला है | बोली हमारी है, बोलना दुसरों का पड़ता है | भेष अपना है, लगाना औरों का पड़ता है | संस्कृति पूर्वजों का है परंतु नाच धून पराये का है | मिट्टी हमारी, राज उनकी | जंगल मेरी पर रजाइँ दुसरों की | मुल्क हमारी लेकिन शासन गोरौं की, सम्पत्ति काले मधेशियों की किंतु नियन्त्रण गोरे नेपालियों की |

समस्या हमारी है, समाधान उनके हाथ में | वोट हम देते हैं, सरकार वो चलाते हैं | आन्दोलन हम करते हैं, फैसला वो देते हैं | मांग हमारी होती है, दाता नेपालीयो फिरंगी होते हैं |
यहाँ खुदको हम नेपाली कहलाते हैं, इसके लिए प्राण की आहूतियाँ देते हैं परंतु हमारे मालिक सदैव हमें काले, धोती, बिहारी मधेशी होने का रहस्य बताते हैं |

हम जानते हैं, समझते हैं, सोचते हैं, लड़ते हैं, मरते हैं, सहीद कहलाते हैं परंतु चन्द स्वार्थ, क्षणिक लालच, थोड़ी नेतागिरी के लिए हरकुछ भुलकर गुलामी के जाल में फँस जाते हैं और आनेवाले भविष्य के आगे लम्बे, गहरे और जटिल भंवर खोद जाते हैं |
यह ही हम मधेशियों का जिन्दगानी है, वर्षों वर्ष की असली कहानी है।

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